Brands
Discover
Events
Newsletter
More

Follow Us

twitterfacebookinstagramyoutube
ADVERTISEMENT
Advertise with us

स्वच्छता, पौधरोपण और टूरिज्म बिजनेस... अपने गांव में बदलाव की बयार लेकर आया यह यूथ एक्टिविस्ट

पबित्रो आज न सिर्फ अपने गांव को स्वच्छ रख रहे हैं बल्कि लाखों की संख्या में पौधरोपण कर पर्यावरण को भी सहेजने की कोशिश कर रहे हैं. इसके साथ ही वह अपने गांव के लोगों को टूरिज्म बिजनेस के लिए भी तैयार कर रहे हैं. इन्हीं प्रयासों के चलते बालीगांव को साल 2016 में ग्रीन विलेज अवार्ड मिला था.

स्वच्छता, पौधरोपण और टूरिज्म बिजनेस... अपने गांव में बदलाव की बयार लेकर आया यह यूथ एक्टिविस्ट

Sunday August 07, 2022 , 6 min Read

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि स्वच्छता को अपने आचरण में इस तरह अपना लो कि वह आपकी आदत बन जाए. गांधी के इन्हीं विचारों से प्रेरित असम के आदिवासी युवा न सिर्फ अपने जीवन में बल्कि अपने गांव और समाज में भी बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं.

हम जिस युवा सामाजिक कार्यकर्ता की बात कर रहे हैं, वह असम के सोनितपुर स्थित बालीगांव के रहने वाले हैं. वह असम के दूसरे सबसे बड़े आदिवासी समुदाय मिसिंग ट्राइब्स से आते हैं. उनका नाम पबित्रा माली है.

पबित्रो आज न सिर्फ अपने गांव को स्वच्छ रख रहे हैं बल्कि लाखों की संख्या में पौधरोपण कर पर्यावरण को भी सहेजने की कोशिश कर रहे हैं. इसके साथ ही वह अपने गांव के लोगों को टूरिज्म बिजनेस के लिए भी तैयार कर रहे हैं. इन्हीं प्रयासों के चलते बालीगांव को साल 2016 में Indian Green Building Council (IGBC) की ओर से ग्रीन विलेज अवार्ड मिला था.

कौन हैं पबित्रा माली?

पबित्रो मीली की पढ़ाई लिखाई असम से ही हुई है. उन्होंने दिसपुर के कॉलेज से अपना ग्रेजुएशन किया है. दिसपुर यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ टूरिज्म मैंनेजमेंट (MTM) किया है. उसके बाद उन्होंने साल 2014 में डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स पूरा किया.

हालांकि, शहर से पढ़ाई पूरी करने के बाद पबित्रा जब वापस गांव लौटे तो उन्हें बेहद निराशा हुई. यहां आकर उन्होंने देखा कि एजुकेशन को लेकर कोई खास ग्रोथ नहीं हुआ है.

इसके बाद पबित्रो अपने गांव की विलेज डेवलपमेंट कमिटी और यूथ डेवलपमेंट कमिटी की बैठकों में जाना शुरू कर दिया. ये बैठकें यहां गांव के विकास के लिए हर हफ्ते होती हैं.

YourStory से बात करते हुए पबित्रो ने कहा कि मेरे वापस आने के बाद साल 2014 में बालीपारा फाउंडेशन ने आकर इको टूरिज्म डेवलपमेंट कमिटी बनाने को लेकर गांव वालों के साथ चर्चा की. उन्होंने इसके लिए गांव के लोगों की एक मीटिंग बुलाई. इस मीटिंग में मुझे इको टूरिज्म डेवलपमेंट कमिटी का प्रेसिडेंट चुना गया. उस टीम में 25 से अधिक लोग शामिल थे और मैंने उस टीम को लीड किया.

बता दें कि, साल 2005 से एनजीओ बालीपारा फाउंडेशन एनजीओ ने बालीगांव में टूरिस्ट को लाना शुरू किया था. वे टूरिस्ट को मिसिंग कल्चर दिखाने के लिए लाते थे.

हालांकि, धीरे-धीरे लोग यह कहते हुए उस टीम से जाने लगे कि इससे कुछ नहीं होगा. तब पबित्रो ने सभी को बहुत समझाया कि धीरे-धीरे काम करने से हम चीजें बदल सकतें हैं और अपने गांव को बेहतर बना सकते हैं. हालांकि, अंत में केवल पबित्रो और उनके एक दोस्त टीम में बचे.

सफाई को गांववालों की आदत बना दिया

हिम्मत नहीं हारते हुए पबित्रो ने कहा कि हमारा उद्देश्य यही था कि अपने गांव के लिए कुछ करना है और जो काम शुरू किया है उसे खत्म भी करना है. इसलिए हमने अपने गांव को क्लीन करने का बेड़ा उठाया. हमने गांव में क्लीन ड्राइव शुरू किया. हमने घर-घर जाकर बच्चों, बड़ों, बूढ़ों और खासतौर पर महिलाओं को हर रविवार को इस अभियान का हिस्सा बनने के लिए तैयार किया. महिलाओं को साफ-सफाई में खास रूचि होती है, इसलिए हमने उन पर ज्यादा फोकस किया.

पबित्रो आगे कहते हैं कि हम हर सप्ताह सफाई करने लगे. इस तरह से आज यह लोगों के व्यवहार में भी शामिल हो गया है. वे अब रोजाना सफाई पर ध्यान देते हैं. वहीं, कूड़ा रखने के लिए हमने खुद बंबू का डस्टबिन तैयार किया है. अब हमारे यहां प्लास्टिक नहीं दिखाई देते हैं. हमारे यहां एक नदी जियाबरोली है, हम उसकी सफाई का भी खास ख्याल रखते हैं.

pabitro-mili-social-change-cleanliness-plantation-and-tourism-business

पबित्रो बताते हैं कि इसके साथ ही वह और उनकी टीम टूरिस्ट को गांव दिखाते थे. मीशिंग कम्यूनिटी के बारे में बताते थे. मीशिंग कम्यूनिटी का इतिहास क्या है, वे कैसे रहते हैं, हमारा फेस्टिवल कब होता है आदि.

5 साल में लगाए 2 लाख पौधे

पूरे इलाके में सफाई अभियान चलाने के बाद पबित्रो ने देखा कि इलाके में मिट्टी का कटाव बेहद तेज हो गया है और इसके बाद उन्होंने वहां पर पौधरोपण करने का फैसला किया.

पबित्रो बताते हैं कि हम लोगों के पास उसके लिए इतना पैसा नहीं था. हम लोगों ने फॉरेस्ट डिपार्टमेंट जाकर इसके बारे में बात की और एक आवेदन दिया. हालांकि, अधिकारी ने हमें पौधे देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि हर कोई पौधे ले जाता है लेकिन कोई पौधरोपण नहीं करता है.

pabitro-mili-social-change-cleanliness-plantation-and-tourism-business

पबित्रो आगे बताते हैं कि बहुत समझाने के बाद उन्होंने हमें कुछ पौधे लगाने के लिए दिए. हमने 2017 से पेड़ लगाने शुरू किए. इस दौरान हमने कृष्णसूरा, भेलो और मैंगो समेत अन्य पेड़ लगाए.

इस तरह पबित्रो के प्लांटेशन को देखकर बालीपारा फाउंडेशन ने उनकी मदद करने की ठानी और इसके बाद उन्होंने पौधरोपण के लिए उन्हें पौधे देने शुरू कर दिए.

पबित्रो बताते हैं कि 2017 से 2022 तक बालीपारा फाउंडेशन की मदद से हमने 2 लाख से भी अधिक पौधे लगाए हैं. ये पौधे हमने बालीगांव के साथ पड़ोस के नदी किनारे स्थित गांव सिकम में लगाए. बालीपारा फाउंडेशन ने पौधे देने के अलावा उन्हें लगाने में मदद करने वाले लेबरों को मजदूरी देने का भी काम किया.

बच्चों को दे रहे स्वीमिंग की ट्रेनिंग

कोविड-19 के दौरान जब स्कूल-कॉलेज बंद हो गया था. तब बच्चे घर पर ही रहते थे. ऐसे में पबित्रो ने बच्चों को स्किल्स सिखाने का फैसला किया. उन्होंने एक टीम बनाकर अपने पैसों से लाइफ जैकेट खरीदकर बच्चों को स्वीमिंग की ट्रेनिंग देना शुरू किया.

खोला है अपना होमस्टे

पबित्रो बताते हैं कि मैंने यहां पर अपना खुद का होमस्टे खोला है. इस होमस्टे में तीन कमरे हैं. टूरिस्ट यहां आकर रुकते हैं. इसके साथ ही मेरी अपनी खुद की नर्सरी भी है. मैं इससे अपना खर्च निकालता हूं और अपनी सेविंग से इन कामों में खर्च करता हूं.

वह बताते हैं कि टूरिस्ट के आने से गांव के कई लोगों की इनकम होने लगी है. यहां टूरिस्ट हर महीने कम से कम 50-60 कपड़े खरीदते हैं. इससे भी लोगों की इनकम हो रही है.

कहां से मिली प्रेरणा

पबित्रो बताते हैं कि उनके अंकल कमीशन मिली गांव के सामाजिक कामों में बहुत रूचि रखते थे और वह गांव को लेकर बहुत कुछ करते थे. हमारे गांव में जब स्कूल नहीं था तब वह गांव में स्कूल भी लेकर आए. वह गांव में सफाई अभियान भी चलाते थे. उनका क्लीन विलेज का सपना था. पबित्रो ने कहा कि इससे मुझे भी प्रेरणा मिली और धीरे-धीरे मैंने भी गांव के सामाजिक कार्यों में रूचि लेना शुरू कर दिया.